क्या किसी बच्चे को ऐसे में यूं खेलने देना चाहिए……?
भीषण गर्मी का समय है। सुबह तपाती है। दोपहर झुलसाती है। हालत यह कि शाम को सूरज के अस्त होने के काफी देर बाद तक भी गर्म हवा के थपेड़े परेशान करते रहे हैं। मई की इसी दोपहरी में मैं रायपुर के एक खुले मैदान में करीब एक दर्जन बच्चों को देख रहा हूं। तापमान चालीस डिग्री से ऊपर है। अख़बार सुबह ही सावधान कर चुका कि आज भी मौसम के तेवर इतने ही तीखे रहेंगे। जिस टैरेस से मैं उन बच्चों को देख रहा हूं, उसके कुछ हिस्सों पर छाँव का कब्जा है। रह-रह कर मैं छाँव में जाता हूँ। लेकिन जल्दी ही फिर धूप के हमले का शिकार होना पड़ता है।
क्योंकि ये छाँव उन बच्चों से मुझसे दूर कर रही है।
वो क्रिकेट खेल रहे हैं। वो धूप से बेपरवाह तो दिखते हैं, लेकिन बे-असर नहीं। मैदान में लगा नीम का एक बड़ा पेड़ उनका अस्थायी पवेलियन है। हर बच्चा कुछ-कुछ देर बाद उस नीम के नीचे जाकर कुछ देर के लिए छाँव का सहारा लेता है। उस समय और बाकी मौकों पर भी सब के हाथ जिस तरह खुद के माथे से लेकर सिर तक तेजी से फिसलते हैं, वह बताता है कि उनके शरीर से पसीने का बांध फूट पड़ा है।
एक स्त्री स्वर वातावरण में गूँज रहा है। इनमें से किसी बच्चे की माँ उसे घर आने को कह रही हैं। पसीना पोंछता कोई एक हाथ पल भर के लिए यह काम छोड़कर आवाज वाली दिशा में आश्वासन वाले अंदाज में यह बताते हुए हिलता है कि ‘बस, थोड़ी देर और…. फिर आता हूँ।’ बाकी यह बात मुंह से बोलने का जैसे कोई मौका ही नहीं है। क्योंकि बाल-गोपाल तो ‘भाई आउट कर’ ‘अबे! रन क्यों नहीं ले रहा’ ‘लपक ले कैच’ या फिर ‘आउट’ वाले जोश को अपनी-अपनी पुरजोर आवाज देने में मग्न हैं।
भोपाल में मेरा बेटा इस समय क्या कर रहा होगा?
आज भोजन बहुत अधिक हो गया। मुनगे की फली वाली सब्जी देखकर रहा भी तो नहीं जाता। अंदर के कमरे से कम्प्यूटर का की-बोर्ड चलने की आवाज आ रही है। जो वहां काम कर रहे हैं, मैं उनके पास पल-भर के लिए आया हूँ। लेकिन उनकी निगाहें तो स्क्रीन पर चिपकी हुई हैं। उनसे बहुत कुछ कहना चाहता हूँ। बाहर के दृश्य के लिए अपने भीतर के सारे विचार उड़ेल देना चाहता हूँ। लेकिन क्या वो सुनेंगे? इससे भी बड़ी बात कि क्या वो मेरी बात समझेंगे? फिर भी कुछ तो कहना ही है, क्योंकि वो काम छोड़कर मेरी तरफ सवाल-भरी नजर से देख रहे हैं। उनकी आँखों से साफ़ है कि फिलहाल काम के चलते उनके पास खुद के लिए भी अधिक समय नहीं है। तो मैं इतना भर कहता हूँ, ‘हम जब छोटे थे, तब हमारे पड़ोस में एक अम्माँ मुनगा की सब्जी बनाती थीं। इतनी स्वादिष्ट कि लोग उंगली चाटने लगते थे। जब वो सब्जी तैयार करतीं, तब हम लोग अपनी-अपनी कटोरी हाथ में लेकर उनसे मनुहार करते कि दाई, थोड़ी सब्जी दे दो। फिर वो भरपूर मात्रा में ऐसी सब्जी देतीं कि हम रोटी या चावल के बगैर भी उसे खाकर पेट भर लेते थे।’ उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए बगैर इतना कहकर मैं वापस टैरेस पर आ गया हूँ।
गलती की कि मैं अंदर चला गया, वहाँ धूप तो है ही नहीं।
बच्चे खेल रहे हैं। मैं अपने इर्द-गिर्द लू के थपेड़ों के ‘चक्रवात’ को महसूस कर रहा हूँ। बच्चे जहां खेल रहे हैं, वो तो खुला मैदान है। लू वहां आततायी का रूप ले चुकी होगी। ‘खेलते रहो’ न जाने किसने मेरे कान में ये कहा। मानव का कान और गला आपस में जुड़े हुए हैं। इसलिए अज्ञात जगह से आया जो स्वर मेरे कान में समाया, अब वह तेजी से मेरे गले की तरफ आ गया है। अपने लिए आवाज पाने की खातिर। पेट जमकर भरा हुआ है। नींद के असर से आँख भारी हो रही है। हो गई। लेकिन आँख खोलना होगी। क्योंकि वो बच्चे अब छुपन-छुपाई खेलने लगे हैं। नीम सहित और भी वृक्षों की आड़ में जाकर छिपते हैं और खुले मैदान की धूप के बीच उनका एक सहयोगी उन्हें तलाश रहा है। अरे वाह! और भी बच्चे आ गए। जो क्रिकेट के उस खाली हुए मैदान पर हॉकी खेल रहे हैं। आज कुछ तो अलग बात है। क्योंकि बच्चों की तादाद और बढ़ गयी है। शायद सारे शहर के नौनिहाल यहीं आ गए हैं। किसलिए? किसके लिए? वो गेंद भी खेल रहे हैं। दौड़ लगाने में मस्त हैं।
रायपुर के बाजार रविवार को बंद रहते हैं। मुझे बेचैनी हो रही है।
माँ का हृदय है। वह स्त्री न जाने इनमें से किस बच्चे की माँ है, लेकिन वह धूप से सने उस मैदान में आकर खड़ी हो गई है। वह गुस्से में कुछ कह रही हैं। धूप से बीमार होने की बात बता रही हैं। ‘घर आओ, तुझे बताती हूँ’ वाला क्रोध दिखा रही हैं। मगर शायद कोई ख़ास असर नहीं हो रहा। वो तमतमाते अंदाज में तेज क़दमों से अपने घर की तरफ जा रही हैं। क्या छड़ी लेकर बाहर आएंगी? वो बाहर आ रही हैं। हाथ में पानी की कई बोतलें और शायद खाने का कुछ सामान है। मैं कुछ दूर होने के बाद भी महसूस कर सकता हूँ कि वो गुस्सा हैं। चिंतित हैं। इस सबसे बढ़कर वो माँ हैं। मैदान के कोने-कोने में छितरी धूप की ‘आगजनी’ इन ढेर सारे बच्चों पर बेअसर है।
मेरा मोबाइल फोन बज रहा है, लेकिन मुझे अभी किसी से भी बात नहीं करना है
मोबाइल के शोर से झटका लगा। आँख खुल गई। सामने बच्चे तो हैं, लेकिन उतने अधिक नहीं, जितने मुझे अब से एक पल पहले तक दिख रहे थे। वो बच्चे स्टंप, बैट और गेंद समेट रहे हैं। यह उनके घर जाने का समय है। क्या मैं उन्हें रोक लूँ? क्या ऐसे भीषण मौसम के बीच कोई भी उन्हें वहीं रुकने के लिए कह सकता है? फिर भी कुछ तो किया जा सकता है। मैं टैरेस से नीचे जाना चाहता हूँ। उन बच्चों से कहना चाहता हूँ कि रुको। और खेलो। धूप से बचो, लेकिन ऐसे ही खेलो। लेकिन यहां रविवार को बाजार क्यों बंद रहते हैं? ये तो गलत है
और गलत यह भी कि आज रविवार है।
मैं ऊपर ही हूँ. बच्चे मेरे सामने से गुजर रहे हैं। सभी संपन्न परिवार के दिखते हैं। सभी के घर में इतना पैसा जरूर होगा कि बच्चों के लिए लूडो, सांप-सीढ़ी और व्यापार जैसे खेल खरीदे जा सकें। उन्हें शतरंज मिले और वो तमाम खेल, जिनसे जुडी सौंधी-सौंधी याद आज भी मुझे बचपन के आँगन में ले जाकर खड़ा कर देती है। मैं उन बच्चों के आगे याचक बनकर खड़ा होना चाहता हूँ। उनसे आग्रह करना चाहता हूँ कि घर जाकर ऑनलाइन गेम मत खेलना। ये धूप कितनी भी तीखी क्यों न हो, लेकिन इसमें तुम्हारे बचपन को बचाए रखने की वह छाँव मौजूद है, जिसका कोई मुकाबला ही नहीं है। हाँ, रविवार न होता तो तुम में से हर किसी के लिए बाजार जाकर लूडो और सांप सीढ़ी खरीदना चाहता था। उसे मेरा तोहफा नहीं, आशीर्वाद भी नहीं, बस अपने बचपन के लिए मेरी प्रार्थना भर मान लेना। कल भी आओगे ना खेलने के लिए? आना, कल मैं जाकर सब सामान ले आऊंगा। तब तक रुको। वो देखो, आसमान से उड़ते हवाई जहाज के लिए दौड़ते हुए, ‘हवाई जहाज! चिट्ठी दो’ का भूला-बिसरा शोर दोहराओ। एक-दूजे के आगे-पीछे लाइन में लगकर रेलगाड़ी का खेल खेलो।
फिर वही सवाल
……क्या किसी बच्चे को ऐसे में यूं खेलने देना चाहिए?
……हाँ, हर बच्चे को ऐसे में यूं ही खेलने देना चाहिए
अभी तो शाम भी नहीं हुई है। फिर रात आनी है। इसके बाद भी सोमवार की सुबह के लिए लंबा इंतजार करना होगा। ये इंतजार कब ख़त्म होगा……? मेरी ये छटपटाहट बढ़ती ही जा रही है। मेरे बच्चों, तुम ही बता दो कि ये सोमवार आएगा या नहीं? बुला लो इस सोमवार को, उतनी ही शिद्दत के साथ, जितनी शिद्दत से मैं तुम्हें बुला रहा हूँ।
(लोकदेश के लिए सुनील त्रिवेदी का आलेख)


