मध्यप्रदेश में सीहोर को राजधानी भोपाल का सबसे नजदीकी जिला होने का गौरव हासिल है। नर्मदा, पार्वती, दूधी और नेवज जैसी पवित्र नदियों के तट पर बसे इस शहर की बात ही अलग है। लेकिन इन्हीं नदियों का पावन जल जब अपने किनारों से कुछ दूरी पर निर्दोष लोगों का लहू बहता देखता होगा, तो क्या वो अंतहीन पीड़ा से नहीं भर जाता होगा? सीहोर में अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के बीच धर्म का धंधा जोरों पर चल निकला है। इसमें रुद्राक्ष की सौदागरी की जा रही है। व्यवसाय को तिजारत भी कहते हैं। इस तिजारत में हर वो हिकारत की नजर से देखा जा रहा है, जो एक दिन पहले से लेकर पूर्व में भी सिर्फ इसलिए अकाल मृत्यु का शिकार हो गया कि उसने किसी स्वयंभू चमत्कार को नमस्कार करने की प्रलयकारी भूल कर ली।

आम भारतीय दरअसल पाखंड से भरा हुआ है। इसलिए पाखंडियों के लिए उसकी श्रद्धा पलक झपकते ही जन-सैलाब में तब्दील हो जाती है। बात देश के उस बहुत बड़े मूढ़मति वर्ग की है, जो धड़ल्ले से अपने सही-गलत को अंजाम देता जाता है, इस अंधविश्वास के साथ कि ‘बाबा तो हैं। उनका चमत्कारी रुद्राक्ष भी है। तो हमारे हर गलत को बाबा का रुद्राक्ष वैसे ही ठीक कर देगा, जैसे कई लोग काला धन को सफ़ेद कर देते हैं।’ यकीनन, हर श्रद्धालु ऐसा नहीं है, लेकिन जो ऐसे नहीं हैं, वो खुद भी वैचारिक रूप से नपुंसक ही कहे जाएंगे। क्योंकि वो अपनी समस्याओं से संघर्ष करने की बजाय उनका हल ऐसे भगवापोशों में तलाशते हैं, जो इतने ‘शक्तिशाली’ हैं कि खुद की एक करतूत के चलते किसी समुदाय के सामने नाक रगड़ने का महान ‘पराक्रम’ भी दिखा चुके हैं।

भारतीय संविधान ने सभी को आजीविका का अधिकार भी दिया है। आप बेशक अपनी ‘ऐसी दुकान’ भी चलाइए। धड़ल्ले से चला भी रहे हैं। क्योंकि वो शासन-प्रशासन तो आपके सामने नतमस्तक है, जो किसी गरीब दुकानदार का पक्का अतिक्रमण तो दूर, उसके खोमचे तक को निर्दयता से ठिकाने लगा देता है। मगर आपकी दुकान के अतिक्रमण का संक्रमण ऐसा कि आप कोई कार्यक्रम रचते हैं तो सारे शहर सहित राजमार्ग का यातायात पंगु हो जाता है। उधर देश के कई हिस्सों में साधारण कांवड़िये सड़क या प्रकृतिजन्य हादसों में जान खो देते हैं और इधर आपकी कांवड़ यात्रा का प्रपंच दो लोगों की असमय अर्थी तैयार होने का सबब बन जाता है। आखिर क्यों आप अपने मीडिया मैनेजर्स के जरिए अपने किसी आयोजन के लिए ‘देखिए, पहला दिन पहला शो’ वाले अंदाज में मुनादी पिटवाते हैं? पूजा-अर्चना करनी है तो बेशक कीजिए। लेकिन नहीं! मजमा नहीं जमेगा तो रंग कैसे जमेगा? तो एक बार फिर जम गया खून का वो रंग, जो इसी तरह से इससे पहले भी सीहोर की पवित्र भूमि को कलंकित कर चुका है। फिर भी आप तो आप हैं। ‘गद्दी’ पर बैठकर देशव्यापी नेटवर्क वाली दुकान चला रहे हैं। आपको इस सबसे क्या! आप तो रुद्राक्ष के सौदागर बने रहिए और गिनते रहिए कि ऐसी अभागी लाशों से आपकी टीआरपी में और कितना उछाल आता जा रहा है। जय हो।

(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी)


