Saturday, January 17, 2026
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मैंने छह साल की उम्र से जिसे पाला, मुझे उस मृत बेटे की ‘सौतेली’ माँ तो मत कहो

हर्ष महज छह साल के थे, जब उनकी जैविक माँ का निधन हो गया. जयश्री उनकी दूसरी माँ बनीं। उन्होंने हर्ष को पाला-पोसा और ऐसी परवरिश दी कि ये बच्चा आगे जाकर भारतीय वायु सेना में अधिकारी बन गया. 

लेकिन उसी हर्ष की मौत के बाद जयश्री को तब धक्का लगा, जब भारतीय वायुसेना ने उन्हें ‘सौतेली’ माँ बताते हुए फैमिली पेंशन देने से मना कर दिया।

मामला सुप्रीम कोर्ट में है और खुद कोर्ट ने कहा, ‘माँ एक बहुत व्यापक शब्द है. 

सुप्रीम कोर्ट में वायु सेना की तरफ से पेश हुए वकील ने नियमों के आधार पर जयश्री को पेंशन देने का विरोध किया। उन्होंने पहले के कुछ उदाहरण भी दिए, जिनमें सेना ने किसी सौतेली माँ को पेंशन देने से मना कर दिया। 

जवाब में कोर्ट ने वकील से कहा, ‘‘‘ अगर कोई बच्चा पैदा होता है और जैविक मां का निधन हो जाता है तथा पिता दूसरी शादी कर लेता है… सौतेली मां, जब से बच्चे को स्तनपान की जरूरत होती है, तब से उसका पालन-पोषण करती है और फिर वह सेना, वायु सेना और नौसेना का अधिकारी बन जाता है। अगर उसने वास्तव में उस बच्चे की देखभाल की है, तो क्या वह उसकी मां नहीं है?’’

मामले की सुनवाई कर रहे जज ने कहा, ‘आजकल दुनिया में बहुत सी चीजें हो रही हैं. ऐसे में बच्चे का पालन-पोषण केवल जैविक माँ  ही नहीं करती है.’

कोर्ट ने वायु सेना के वकील से कहा, ‘न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘नियम ऐसी चीज है जो आपने तय की हैं। नियम संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है… हम इन नियमों के पीछे के तर्क पर सवाल उठा रहे हैं। आप तकनीकी रूप से सौतेली मां को विशेष पेंशन या पारिवारिक पेंशन से कैसे और किस आधार पर वंचित कर सकते हैं?’’

 न्यायालय ने कहा है कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या भारतीय वायुसेना के नियमों के तहत पारिवारिक पेंशन के लिए सौतेली मां के नाम पर विचार किया जा सकता है या नहीं।

उन्होंने मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त के लिए निर्धारित की।  

एएफटी के फैसले को दी है चुनौती 

शीर्ष अदालत जयश्री की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने अपने सौतेले बेटे हर्ष को उसकी जैविक मां के निधन के बाद पाला था।  उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के 10 दिसंबर, 2021 के फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनके पुत्र, जो वायु सेना में थे, के निधन के बाद पारिवारिक पेंशन देने से इनकार कर दिया गया था।  पिछले साल 19 जुलाई को शीर्ष अदालत ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी और केंद्र तथा वायु सेना को नोटिस जारी किया था। 

(लोकदेश डेस्क/एजेंसी। नई दिल्ली)