अपने सरकारी निवास पर मिले जले हुए नोट के चलते विवाद से घिरे जस्टिस यशवंत वर्मा (देखें छायाचित्र) के लिए यह उनके जले पर नमक गिर जाने जैसा मामला है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा से बुधवार (30 जुलाई, 2025 को साफ का कि उन (वर्मा) का आचरण संदिग्ध है.
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के लिए यह तल्ख़ टिप्पणी उस समय की, जब जस्टिस यशवंत वर्मा ने याचिका की सुनवाई के दौरान की जिसमें जस्टिस वर्मा ने इन-हाउस जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है। इस रिपोर्ट में उन्हें कदाचार का दोषी पाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने नकदी बरामदगी मामले में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को अमान्य करार देने का अनुरोध करने वाले न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आचरण को विश्वसनीय न बताते हुए बुधवार को उनसे तीखे सवाल पूछे और कहा कि उनका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता है.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने यशवंत वर्मा से पूछा, “जब आपको समिति की वैधता पर आपत्ति थी, तो फिर आप उसके सामने पेश ही क्यों हुए?” कोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि उन्हें जांच प्रक्रिया पर आपत्ति थी, तो वे पहले सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं आए?
बेंच ने यह भी साफ़ किया कि यदि मुख्य न्यायाधीश के पास किसी न्यायाधीश के दुराचार से संबंधित विश्वसनीय सामग्री हो, तो वे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को इसकी जानकारी दे सकते हैं।
जस्टिस यशवंत वर्मा की पैरवी के लिए पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दलील दी कि इन-हाउस जांच समिति की सिफारिश असंवैधानिक है और इस तरह हटाने की प्रक्रिया शुरू करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक मिसाल होगा।
सिब्बल ने कहा, “इस प्रकार की सिफारिश एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है।”
यह मामला उस विवाद से जुड़ा है जिसमें कथित तौर पर जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने की बात सामने आई थी। इसके बाद एक आंतरिक जांच समिति का गठन किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस यशवंत वर्मा के स्पष्टीकरण को असंतोषजनक मानते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी।
(लोकदेश डेस्क/एजेंसी। नई दिल्ली)


