एक बड़े घटनाक्रम ने उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक भारतीय जनता पार्टी की सियासत में खलबली मचा दी है
बात ये कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने उत्तरप्रदेश के साठ से अधिक जिला प्रचारकों के पदों में फेरबदल करते हुए बड़े संगठनात्मक बदलाव किए हैं
यूं तो बड़े पैमाने पर हुई इस तब्दीली को इस राज्य में अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों और साल दो हजार सत्ताईस के विधानसभा चुनावों की तैयारियों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। लेकिन इसे लेकर एक बहुत बड़ा सवाल भी उठ खड़ा हुआ है.
सवाल यह कि क्या इस कदम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए संघ के विश्वास में कुछ कमी का संकेत भी मिल रहा है?
क्योंकि बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तरप्रदेश से सबसे बड़ा झटका मिला था. इस राज्य की सैतींस सीटों पर समाजवादी पार्टी जीती थी. जबकि भाजपा के हिस्से में महज तैतींस सीट आ सकी थीं.
माना गया था कि इस कमजोर नतीजे के चलते ही भाजपा को पूरा बहुमत नहीं मिल सका.
इस नतीजे के नतीजे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योगी आदित्यनाथ से नाराजगी की चर्चाएं भी चली थीं, क्योंकि उत्तर प्रदेश उन राज्यों में शामिल रहा, जहां के नतीजे भाजपा के पक्ष में आने के विश्वास के चलते ही मोदी ने लोकसभा चुनाव में ‘अबकि बार चार सौ पार’ का नारा दिया था.
अब संघ के इस कदम से यह माना जा रहा है कि आरएसएस इस राज्य के आने वाले चुनावो में अकेले योगी की छवि के सहारे बैठने का जोखिम लेना नहीं चाह रहा है. इसीलिए उसने अपने नेटवर्क को मजबूत करने के लिए बड़े बदलाव को अंजाम दे दिया है.
ऐसा सोचने और मानने का सच तो संघ ही जाने। लेकिन हम यह बता दें कि संघ ने जिन जिला प्रचारकों को थोकबंद तरीके से बदला है, वो कार्यकर्ताओं को संगठित करने और जमीनी स्तर पर वैचारिक पहुंच को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अब देखने वाली बात होगी कि ये मजबूती कहीं योगी की लोकसभा चुनाव वाली कमजोरी का जवाब तो नहीं है?

(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी की रिपोर्ट)


