Thursday, January 15, 2026
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जलते रहना होगा उस चिराग को         

 (1 अगस्त, मीना कुमारी की जयंती पर विशेष)

मेरे लिहाज से मीना कुमारी की स्मृति से जुड़ा रेखाचित्र खींचना बहुत कठिन है। क्योंकि इसकी अनिवार्यता यह कि इसके लिए आपकी कलम सहित भाव और स्वयं आप को खून और पसीने से भरे हुए आंसुओं के सैलाब में डूबते हुए उसे पार करना होगा। और ऐसा करके तो देखिए। आपको अपने भावुक होने की सार्थकता का भान हो जाएगा। 

‘साहब, बीवी और गुलाम’ में आप ‘छोटी बहु’ की एंट्री के आगे जा ही नहीं सकते। जब तक कि उस दृश्य और भूतनाथ (गुरु दत्त) से मीना जी के संवाद को बार-बार नहीं देख लेते। क्योंकि फिल्म को शुरू हुए पचास मिनट बीत चुके हैं। लेकिन मीना कुमारी कहां हैं? ‘कोई दूर से आवाज दे’ वाली गीता दत्त की पुकार ही बता रही है कि यह छोटी बहु, यानी मीना जी के दर्द की बात है। अंतहीन हो रही प्रतीक्षा के बाद आपको, ‘बंसी! तू जा यहां से’ के रूप में पहली बार अभिनय को अदायगी से श्रृंगारित करने वाली आवाज सुनाई देती है। उसके बाद जब मीना पहली बार सामने दिखती हैं तो परदे पर गुरु दत्त और परदे के परे दर्शक सम्मोहन में डूब जाता है। क्योंकि प्रतीक्षा के पूरा होने का वह सुख वर्णन से परे है।मीना जी ने निजी दर्द को अपने किरदारों की प्राण प्रतिष्ठा हेतु समर्पित कर दिया।

‘दिल एक मंदिर’ में पति और पूर्व प्रेमी के बीच वाली उहापोह से जूझती ब्याहता से लेकर ‘मेरे-अपने’ में समाज के बदसूरत चेहरे से संघर्ष कर रही वृद्धा तक की भूमिका में मीना जी ने इसी दर्द से जान फूंकी। लेकिन इस अवस्था से फ्लक्चुएशन का उनका अंदाज हतप्रभ कर देता है। ‘साहब, बीवी और गुलाम’ की अंततः शराब पीने लगी नायिका नशे की ही हालत में यदि बगावती दिख रही है तो उसी हालत में ताउम्र सताने वाले पति से, ‘तुम घबराना नहीं, बस मैं गयी और आयी’ वाले संवाद में मीना ने पतिव्रता स्त्री के अभिनय की उसी समान श्रेष्ठता के साथ का परिचय दिया है। ‘संसार से भागे फिरते हो’ में यदि आप साहिर जी के रेवोल्यूशन को पाते हैं तो यह भी पाएंगे कि साहिर के इन तेवर को मीना जी ने ही अपनी अदायगी से जिस्मानियत प्रदान की है। 

फिर ऐसा क्या आसानी से संभव है कि ‘नगमा-ओ-शेर की सौगात’ वाली शोखी इसी गीत के दर्द वाले वर्शन ‘रंग और नूर की बारात’ के समय पीड़ा से भर देने वाले अभिनय में परिवर्तित हो जाए? ‘यहूदी’ में ‘मेरी जां-मेरे जां’ वाली मस्ती के बाद ‘आंसू की आग ले के तेरी याद आयी’ के बीच खुशी तथा दुःख के संतुलन को मीना जी जो संतुलन प्रदान करती हैं, वह विस्मय से भर देता है। फिर प्रतीकात्मक वाले अभिनय की बात कीजिए। ‘सुशीला’ में ‘ओ चाँद जहां वो जाएं’ देखिए। अपने प्रियतम की याद में गीत गा रही मीना जब ‘परदेस में राही को मंजिल का पता देना’ कहते हुए प्रकारांतर से खुद की तरफ ही इशारा करती हैं, तब स्वयं को मंजिल में ढाल देने का वह भाव ला और दिखा पाना आसान नहीं है।

‘चाँद तनहा है’ को मीना जी की ही आवाज में सुनिए। आप इस यकीन से भर जाते हैं कि वाकई चमन में किसी ऐसे दीदावर के पैदा होने के लिए नरगिस हजारों साल अपनी बेनूरी पर ही रोती रहती होगी। जिन्होंने मीना जी को दर्द दिया और जो उनके दर्द से खेल गए, उनके मन की थाह नहीं पाई जा सकती। भला कोई कीचड़ में उतरना क्यों चाहेगा? हाँ, इच्छा ही रह गयी कि ‘शराबी-शराबी ये सावन का मौसम’ या ‘हम इंतज़ार करेंगे’ वाली मीना जी के हृदय में उतरकर देख सकूं कि इन गानों वाले अभिनय के समय वह दर्द से भरे अपने दिल को किस कोने में छिपा देती थीं। ‘शबे इंतज़ार आखिर कभी होगी मुख़्तसर भी’ में मीना जी का हाथ चाँद की तरफ जा रहा है। वह ‘ये चिराग बुझ रहे हैं, मेरे साथ जलते-जलते’ वाले बोलों को अपने अभिनय से जीवित कर रही हैं। और मैं कोफ़्त में भरा जा रहा हूँ कि ये गीत के ख़त्म होने का वक्त है। मीना जी को पूरी तरह समझने वाली शबे-इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होगी। हाँ, उनकी यादों के चिराग न बुझने पाएं, भले ही उनके चाहने वाले इन्हीं चिरागों के नीचे पसरे अँधेरे में जीवन की शाम पूरी कर लें। वह चिराग जलता ही रहेगा, मीना जी की यादों को रोशन बनाए रखने के लिए।

( लेखक – रत्नाकर त्रिपाठी)