Sunday, January 18, 2026
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क्या सचमुच एक निर्दोष जज के लिए इतना गलत फैसला दे दिया देश की सुप्रीम कोर्ट ने ?

क्या इसे सुप्रीम कोर्ट का एक जज के लिए गलत आदेश कह सकते हैं? या फिर इसे समय रहते भूल सुधारने की समझदारी का मामला कहा जाए? 

बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना एक अभूतपूर्व आदेश अचानक वापस ले लिया है. 

दरअसल कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार को उनके रिटायरमेंट तक हरेक क्रिमिनल केस की सुनवाई से अलग रखने और उन्हें एक अनुभवी सीनियर जज के साथ बेंच में बैठाने के अपने अभूतपूर्व आदेश को शुक्रवार को वापस ले लिया।

सीजेआई बी आर गवई से प्राप्त एक पत्र पर गौर करते हुए जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने आदेश वापस लेते हुए यह भी कहा कि उस (सुप्रीम कोर्ट) का इरादा संबंधित जज को शर्मिंदा करने या उन पर आक्षेप लगाने का नहीं था।
उच्च न्यायालय के आदेश को हालांकि “अवैध और विकृत” बताते हुए शीर्ष अदालत ने इस मामले पर विचार करने का काम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर छोड़ दिया।
पीठ ने कहा, “हम पूरी तरह से स्वीकार करते हैं कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रोस्टर के मास्टर हैं यानी वह तय कर सकते हैं कि किस मामले को कौन से न्यायाधीश को सौपा जाए। ये निर्देश (शीर्ष अदालत का) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक शक्ति में बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं करते हैं।”
पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब मामले कानून के शासन को प्रभावित करते हैं, तो यह न्यायालय सुधारात्मक कदम उठाने के लिए बाध्य होगा।
पीठ ने कहा, “हालांकि, जब मामला एक हद पार कर जाता है।‌ जब संस्था की गरिमा खतरे में पड़ जाती है तो अपीलीय क्षेत्राधिकार में भी हस्तक्षेप करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य बन जाता है।”
न्यायमूर्ति कुमार को शीर्ष अदालत के गुस्से का सामना करना पड़ा जब उन्होंने सामान की आपूर्ति के लिए शेष राशि का भुगतान न करने से संबंधित एक मामले में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति देते हुए कहा कि दीवानी मुकदमे में पैसा वसूलने में वर्षों लग जाएँगे।
पीठ ने अपने चार अगस्त के आदेश में उच्च न्यायालय के एकल पीठ के न्यायाधीश के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि संबंधित न्यायाधीश ने न केवल खुद को बदनाम किया है, बल्कि न्याय का भी मजाक उड़ाया है।
पीठ ने कहा, “हम यह समझने में असमर्थ हैं कि उच्च न्यायालय स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है। कई बार हम यह सोचकर हैरान रह जाते हैं कि क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी विचार से पारित किए जाते हैं या यह कानून की सरासर अज्ञानता है। जो भी हो, ऐसे बेतुके और गलत आदेश पारित करना अक्षम्य है।”
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने 5 मई, 2025 के एक आदेश द्वारा कानपुर नगर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-एक की अदालत में अभियुक्त मेसर्स शिखर केमिकल्स को आपूर्ति किए गए सामान के बकाया भुगतान के लिए लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी।
न्यायाधीश ने इसे उचित ठहराते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता को दीवानी मुकदमा दायर करके शेष राशि वसूलने में काफी समय लग सकता है।
उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा था, “यह आदेश इस न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में हमारे कार्यकाल में अब तक देखे गए सबसे खराब और सबसे गलत आदेशों में से एक है।”

(लोकदेश डेस्क/एजेंसी। नई दिल्ली)