पल्लवी जोशी। दूरदर्शन से लेकर बड़े परदे तक अपनी अभिनय क्षमता का वो धमाकेदार परिचय, जो किसी और परिचय का मोहताज नहीं है
हाँ, अफ़सोस कि बॉलीवुड जोखिम लेने के मामले में बेहद कमजोर/डरपोक है. इसलिए पल्लवी को बड़े परदे पर उनकी अद्भुत क्षमता के बावजूद मुख्य भूमिकाओं की बजाय ‘बड़ी या छोटी बहन’ के मकड़जाल में जकड़ दिया जाता रहा.
फिर छोटे परदे के भी छोटी सोच वाले उन दर्शकों का अलग से उल्लेख कर क्यों अपना समय खराब किया जाए, जो तब कहते थे, ‘पल्लवी कभी शबाना आजमी तो कभी स्मिता पाटिल जैसे अभिनय की कोशिश करती हैं.’ और कहने वाले ऐसा इसलिए कह जाते हैं कि उन्हें अभिनय की समझ ही नहीं है.

बड़ा परदा तो खैर कई मर्तबा अजीब तरीके से उस रबर के गुड्डे की तरह हो जाता है, जिसे खींच-तान कर बड़ा किया जाए और जल्दी वो अपनी औकात में लौट आता है. वहाँ बहुधा अभिनय नहीं चाहिए। कंगना रनौत ने जो टेबू अब तोड़ा, वो पल्ल्वी का भी अधिकार था कि वो शो पीस बनकर नहीं दिखेंगी।
‘बुद्ध इन ट्रेफिक जाम’ में सिगरेट के छल्ले उड़ाती पल्लवी की एंट्री बताती है कि विवेक अग्निहोत्री जैसी समझ के मुकाबले बॉलीवुड में कितना दरिद्रपन पसरा हुआ है. फिल्म में अनुपम खेर की पत्नी के किरदार को पल्ल्वी उस दृश्य में और सजीव कर देती हैं, जब खेर एक कार्यक्रम से उठकर भाग रहे हैं और पल्लवी स्नेह तथा चिंता के अद्भुत अभिनय वाले संतुलन के बीच पति को उनका मोबाइल फोन दिखा रही हैं.
‘तृषाग्नि’ के निर्माता का धन्यवाद कि उन्होंने फिल्म के शुभचिंतकों को बताया कि पल्लवी क्या हैं? आप कभी ध्यान से देखिए। सुनिए। आशा भोसले जी की आवाज और पल्लवी का अंदाज। लगा ही नहीं कि नायिका से इतनी बड़ी उम्र की गायिका ने उस गीत को स्वर दिए. लगा यही कि आशा जी के स्वर्गीय अनुभूति वाले कंठ को पल्लवी ने अपने अभिनय से प्राण प्रतिष्ठित कर दिया।

फिर कश्मीर फाइल्स की राधिका मेनन तो कहती ही हैं कि ‘मैं पल्लवी हूं’

तो अब एक इल्तजा है पल्लवी से कि आप प्रकृति को मात मत दे दीजिएगा
क्योंकि आप ‘द बंगाल फाइल्स’ में सौ साल की महिला का किरदार अदा कर रही हैं. यकीनन आपको झुर्रियां पहनाई जाएंगी। और मेरा व्यक्तिगत यकीन यह कि उम्र के साथ झुर्रियां देने वाली प्रकृति के इस अनुशासन को चीरकर आप वह अदाकारी दिखा जाएंगी, जिनके आगे झुर्री भी पानी-पानी हो जाएगी।
क्योंकि आपकी क्षमताओं पर झुर्री उतरने का तो सवाल ही नहीं उठता है.

तो क्या आप मुझे साल 1972 के इज़रायली सिनेमा ‘आई लव यू रोजा’ में ले जाने की तैयारी कर रही हैं? क्योंकि उस फिल्म में रोजा के चरित्र के उस सौ साल के आसपास वाले बाद में दिखाए गए चेहरे पर भी झुर्री तार-तार होकर बिखर जाने को अभिशप्त हो गई थी. लेकिन कभीं भी नहीं लगा कि रोजा वाली अभिनेत्री बुढ़ापे का अभिनय कर रही है. वो बेहद सहज भाव से प्रकृति को सफल चुनौती देती हुई दिखीं।
पल्लवी! आप भी ऐसा ही करेंगी ना! कम से कम मुझे तो ऐसा होने का पूरा विश्वास है. तो मैं तैयार रहूं कि कब आप को आपकी प्राकृतिक अभिनय क्षमता के साथ बेहद संस्कारित तरीके से प्रकृति की झुर्रियों को चुनौती देते हुए देखूं?

(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी)


