Thursday, January 15, 2026
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काश! मिल गया होता उस खत का जवाब

( अदाकारा और गायिका सुरैया जी की जयंती 15 जून पर विशेष)

सिनेमा देखने का मुझे बचपन से ही पागलपन की हद तक का शौक रहा है। यही कारण रहा कि कुछ फ़िल्मी चेहरे मेरे हृदय में घर कर गए। ये वह दौर था, जब फ़िल्मी पत्रिकाओं में उस दुनिया के चेहरों से पत्राचार का पता दिया जाता था। आज समय के संदर्भ में आप इस प्रक्रिया को ‘लिंक देना’ कह कर समझ सकते हैं। तब मैंने इस तरह का इकलौता पत्र लिखकर भेजा था, सुरैया जी को। मैंने उनसे अनुमति चाही थी कि यदि वह मुझे अपने दौर वाली दुनिया के पार का होने के बाद भी अपना प्रशंसक समझ सकें, तो मैं उनसे कुछ समझने की अनुमति चाहूंगा।

उस खत का जवाब कभी भी नहीं आया। जब खबर पता चली कि सुरैया जी अब नहीं रहीं, तब इस उत्तर एवं अनुमति की रही-सही आशा भी नहीं रह गयी।

सुरैया का अर्थ शायद ‘शानदार’ या ‘रोशनी’ के आसपास या बीच में कहीं निवास करता है। सुरैया जी की इस जयंती पर मैं उन्हें इन दो शब्दों के दरमियान ही कहीं तलाशने की चेष्टा को पुनः गति दे रहा हूं।

बात दैहिक सौंदर्य, मधुर गले या अभिनय मात्र की नहीं है। ये सब तो परमपिता परमेश्वर और प्रकृति ने उन्हें भरपूर रूप से दिया। मेरे लिए विषय उस सबका है, जो सुरैया जी का अपना होने के बाद भी उन्हें पूर्णतः नहीं मिल सका। हॉलीवुड के बड़े नाम ग्रेग्री पैक के साथ मुलाकात की सुरैया जी की तमन्ना पूरी हो गयी, लेकिन क्या ये सचमुच इच्छा को पूरी संतुष्टि देने वाला मामला रह सका? सुरैया ने तो देव आनंद के भीतर ग्रेग्री पैक की प्राण प्रतिष्ठा की थी। देव ने भी इस बात को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निभाया। ‘मैकेनास गोल्ड’ में जब-जब आप ग्रेग्री पैक की पीठ देखते हैं तो यह भ्रम कई बार हो जाता है कि कहीं यह देव तो नहीं हैं। देव की कई अदाकारी में उनका चेहरा कुछ देर के लिए अलग कर दिया जाए तो यह गलतफहमी अक्सर आपको घेर लेती है कि हमारे सामने कोई और नहीं, पैक ही हैं। लेकिन सुरैया की खातिर खुद को पैक के रूप में ढाल देने वाले देव भी क्यों इस शख्सियत से अपने संबंधों को किसी स्थाई पहचान की शक्ल में नहीं ढाल सके? क्यों कर ऐसा हुआ कि ये दोनों अंततः उन अलग-अलग रास्तों पर धकेल दिए गए, जहां विछोह की काली छाया ही दोनों को निगल लेने पर आमादा थी?

देव तो तब भी कल्पना के रूप में एक विकल्प को थाम कर तन्हाई से पार पाने में सफल रहे, लेकिन सुरैया ने जैसे तन्हाई को ही अपनी इंतिहाई किस्मत मानकर उसके साये में जिंदगी गुजार दी। क्या कोई आने वाले कल को अपने आज में ढाल सकता है? ‘शमा-परवाना’ में एक दृश्य है। सुरैया के किरदार से दासी पूछती है कि उनके मेहबूब को क्या सन्देश देना है? तब सुरैया गाती हैं, “मेरा दिलदार न मिलाया, मैं क्या जानूं तेरी ये खुदाई?’ यूं तो फिल्म में ये उलाहना नायक शम्मी कपूर से मिलन न हो पाने के लिए दिया गया था, लेकिन जब इस गीत को गाती हुई सुरैया का चेहरा देखता हूं, तो यही लगता है कि यह विछोह उन्होंने देव के लिए पहले ही अपने गायन और अभिनय में उतार लिया था।

‘नुक्तचीं है गमे-दिल’ ‘तेरा ख्याल दिल से भुलाया न जाएगा’ ‘सोचा था क्या, क्या हुआ’ या ‘वो पास रहें या दूर रहें’ में भी सुरैया जी को मैं देव से जुड़े दर्द में ही डूबते-तैरते ही देख पाता हूं।

एक तड़प से भर देती है यथार्थ की यह कडुवाहट कि किस तरह सुरैया जी का एकाकी जीवन अंततः उस एकांकी में परिवर्तित हो गया, जो जीवन के रंगमंच पर कई जज़्बात अपने भीतर ही समेटे हुए निःशब्द इस संसार से हमेशा के लिए विदा हो गया। यदि सुरैया जी ने मेरे पत्र के आग्रह को स्वीकार किया होता तो मैं निश्चित ही उनसे इस सब पीड़ा के बारे में जानने की हिमाकत करता। विश्वास मानिये, ये उनके दर्द को कुरेदने की प्रक्रिया नहीं होती। बल्कि मैं ये करना चाहता कि उनसे किसी चाह के साथ और उसके साये में सारी जिंदगी गुजार देने के महान तत्व के सूत्र तलाशता। यह स्थापित करने का प्रयास करता कि किस तरह खालिस मतलबी कही जाने वाली फ़िल्मी दुनिया में खालिस चाहत वाले लोग भी रहे हैं। मेरी जद्दोजहद ये स्थापित करने के लिए भी रहती कि कैसे कोई अपने तन से लेकर मन, कंठ और अभिनय की दौलत की संपूर्ण स्वामिनी होने के बाद भी अपने जीवन में किसी विकल्प के नाम पर स्वयं को महरूम बनाये रखने में ही खुशी तलाश सकता है?

सुरैया जी! निश्चित ही ये आपकी निजी जिंदगी का मामला है, मुझे या किसी भी और को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, लेकिन चाहत, गम और विछोह तो निजी नहीं हैं। हम में से अधिकांश को उनसे होकर गुजरना पड़ता है। मेरे एक खत का जवाब और उसके बाद की आपकी मेहरबानी कम से कम मेरे लिए इन जज़्बात का सामना करने को कुछ सरल बना देती। काश! उस मेरे एक खत का जवाब मिल गया होता। जयंती पर आपको सादर विनम्र श्रद्धांजलि।

(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी)