Thursday, January 15, 2026
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Homeसोशल मीडिया सेहाँ फरीद... मैं तुम्हारा वाला ही हूँ, मगर तुम कहाँ हो ? 

हाँ फरीद… मैं तुम्हारा वाला ही हूँ, मगर तुम कहाँ हो ? 

एक विनम्र निवेदन है कि इस पोस्ट को कृपया किसी भी रूप में जाति जैसी सोच से न जोड़िएगा। हाँ, ठीक लगे तो पूरा पढ़िए जरूर। 

12 जून का विश्व बालश्रम निषेध दिवस जब भी आता है, कोई बहुत शिद्दत से याद आ जाता है। फरीद।

तब क्या उम्र रही होगी उसकी? शायद नौ या दस साल। बात चौबीस साल पुरानी है।

तब नौकरी की ट्रेनिंग के सिलसिले में दक्षिण भारत के एक राज्य में जाने का मौक़ा मिला। दिन भर काम सीखने के बाद शाम को एक जगह सुकून देती थी, ‘रेड्डी का ढाबा’। उस जगह पर खाना किसी गणित की तरह मिलता था। मसलन, दाल 65, सांबर 90 और भी न जाने क्या-क्या? एक सुविधा भी थी कि धीरे से गला तर कर लो, चुनांचे वो अपनी पसंद की जगह थी।

तब ये लगा था कि वहां फरीद मिला, अब ये लगता है कि ‘मैं फरीद से मिल सका था’ 

वो मस्तमौला नहीं था। जिम्मेदार था कि हमें खाने से पहले और बाद में भी वो मिल सके जो  हम चाह रहे हैं। ‘हम’ से आशय यह कि मेरा एक बेहद अज़ीज़ दोस्त भी साथ था, उसका नाम इसलिए नहीं ले रहा कि ये साझा करने से पहले उससे अनुमति नहीं ली है।

फरीद खालिस ‘काय कू’ ‘आपकू’ और ‘मेरेकू’ वाले लहजे में बात करता था। हर रात हम फारिग होते और कुछ पैसे उसे दे देते थे। इसी बीच एक रात ‘माल तेज़’ हो गया। बात टिप देने से आगे व्यक्तिगत किस्म की हो गई। समझ आया कि वो बच्चा किसी रूप में घर की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए उस ढाबे पर सेवा देता था। 

वो लतीफा तो आपने सुना ही होगा कि एक फ़कीर किसी धार्मिक जगह के आगे बैठा रहा और उसे फूटी कौड़ी भी न मिली। अगले दिन वो एक मयखाने के आगे जा बैठा और रात होते-होते उसकी झोली भर गई। तब उसने ऊपर वाले से कहा, ‘सुनता था कि आप कहीं और मिलते हैं, लेकिन आज पाया कि आप “”कहीं और ही”” मिलते हैं। 

फरीद की बात सुनकर हम दोनों दोस्तों को लगा कि कुछ करना चाहिए। मगर क्या? सो हमने पूछ  लिया कि क्या वो हमारे साथ भोपाल चलेगा? 

अगली रात फरीद और भी परिपक्व बनकर मिला। अब जो उसने बोला, कृपया उसे फिर किसी जाति या धर्म से न जोड़िएगा। उसने कहा, ‘मैंने अम्मी कू बताया कि आप लोगां क्या बोले? वो आपसे मिलने को आएँगे। मैंने यह भी बता दिया कि आप दोनों भी हमारे वाले  ही हैं।’   

फिर कुछ हुआ कि अगली रात वहां नहीं जा सके। ऐसा होता ही  गया और ये तब अर्द्धविराम  पर आया, जब सदर्न एक्सप्रेस भोपाल स्टेशन पर आ कर रुकी। मेरा दोस्त पहले ही हरदा स्टेशन पर अपनी ससुराल जाने के लिए उतर गया था। न हरदा और न ही भोपाल पर फरीद हमारे साथ था। ट्रेन में हम दोस्तों ने बात की थी। अफ़सोस साझा किया था कि फरीद के लिए कुछ नहीं कर सके। 

फिर साल बीत गए। बीतते चले गए। वो शेर है ना, ‘दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया, तुझ से भी दिलफरेब हैं ग़म रोज़गार के’ तो ऐसा ही हुआ। भोपाल आकर कामकाज की व्यस्तता में सब भूल गए। 

लेकिन किसी चुंबक ने यादों के चुंबन के साथ फिर खींचा। एक बार फिर यूं ही उस जगह जाना हुआ। वो ढाबा था। वही गणित के हिसाब से खाना भी था। तब वहां दक्षिण भारत के हिसाब से दुर्लभ कही जा सकने वाली रोटियां  भी मिलने लगी थीं। 

सब था, नया और पुराना, लेकिन फरीद कहीं भी नहीं था। 

उसके बारे में लोगों से पूछा। हर मुंह से सपाट अंदाज में यही जवाब मिला, ‘ऐसे तो आते और जाते रहते हैं।’ 

तभी किसी ने बताया कि ढाबे से करीब तीन किलोमीटर दूर की एक बस्ती में कभी कोई फरीद रहा करता था। 

मैं वहां गया। वो बस्ती ख़त्म हो रही थी। वहां किसी बिल्डर ने बड़ी इमारत तानने की तैयारी कर ली थी। 

मेरी आँखों ने फरीद को बहुत तलाशा, मगर वो कहीं  नहीं था। 

एक तोड़ डाला गया कच्चा घर दिखा, उसके भीतर बना चूल्हा न जाने कैसे तब भी बचा हुआ था। 

क्या वो फरीद का घर था? क्या ढाबे से देर रात तीन किलोमीटर पैदल आने के बाद उस बच्चे ने उसी चूल्हे पर खाना पकाती हुई अपनी अम्मी से कहा होगा कि  ‘वो मेरेकू भोपाल  ले जाएंगे। फिकर नक्को अम्मी, वो हमारे वाले ही हैं।’ 

हां फरीद, मैं तुम्हारा वाला  ही हूँ, लेकिन तुम कहा हो? 

उस चूल्हे को लपेटी  हुई धुएं की कालिख के बीच कुछ मटमैला रंग भी बच गया था? मैं हृदय से चाहता था कि उस पर फरीद के लिए अपने इंतजार का संदेश लिख दूँ, फिर लगा कि……..

करीब पंद्रह साल पहले मैंने ये प्रसंग अपने बड़े बेटे को सुनाया था, न जाने क्यों वो फफक कर रो  पड़ा…. 

नादान बेटा…. ! एक ही घर के दो लोगों का कहीं खुलकर तो कहीं चुपचाप जज़्बाती होना क्या ठीक लगता है…..!!!!!

(छायाचित्र प्रतीकात्मक है) 

(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी