है तो पागलपन ही। लेकिन ये न कहूं, तो मुझे आज की तरह ही हरेक रात की नींद हराम होने का श्राप मिले। ‘लेकिन’ देख रहा हूँ। शायद सौवीं बार। वो चलचित्र, जो चल-चलकर मेरे भीतर उतर आता है। और अनेक मर्तबा उसकी स्मृति मुझे झकझोर कर जगा देती है। गुरुदेव रबीन्द्रनाथ जी के लिखे ‘क्षुधित पाषाण’ की बांगला फिल्म भी मैंने देखी है। उसकी श्रेष्ठता से कोई इंकार भी नहीं है। लेकिन ‘लेकिन’ को देखकर ये हमेशा लगता है कि श्रद्धेय लता मंगेशकर जी महज ऐसी एक महान कृति का ही उपहार क्यों दे सकीं?
अद्भुत फिल्म, जिसे हर बार देखते हुए मुझे पता रहता है कि आगे क्या होगा, लेकिन गुलजार साहब का कमाल और निर्देशक के रूप में उन पर लता जी का विश्वास कि हर बार लगता है कि ‘अरे, ये तो समझ ही नहीं पाए थे। ये तो एक और नयापन है!’
‘लेकिन’ मेरे लिए महज फिल्म नहीं है। वो बताती है कि निर्देशन किसे कहते हैं? दिवंगत विनोद खन्ना सहित डिम्पल कपाड़िया के अभिनय के क्या आदर्श मायने हैं? फिर लता जी का स्नेहिल लता के रूप में यूं भी छा जाना कि फिल्म के अधिकाँश गीत उन्होंने गाए, लेकिन स्क्रीन पर गायक/गायिका की फेहरिस्त में पहला नाम आशा भोसले जी का। हृदयनाथ मंगेशकर और सुरेश वाडकर सहित सहयोगी गायिकाओं का नाम भी परदे पर दिखता है और सबसे नीचे लता जी ने अपना नाम दिया।
इस फिल्म के ऑडियो कैसेट जब रिलीज हुए, तब मैंने लपक कर उसे खरीदा। शुरुआत में लता जी हैं। कह रही हैं कि इस फिल्म और उसके सभी गीत आज की स्त्री को समर्पित कर रही हैं। जब फिल्म के टाइटल देखे, तब लगा कि लता जी का हरेक श्रेष्ठ तत्व के लिए समर्पण था, खुद को सबसे नीचे रखते हुए.

फिल्मों को लेकर अपने पागलपन के अनुसरण के साथ ही मुझे इस बात का पूरा संतोष है कि ‘लेकिन’ को मैं बड़े परदे पर देख सका. वो महज एक हफ्ते के लिए भोपाल के ‘रंगमहल’ में प्रदर्शित की गई थी। वही टॉकीज, जहां इस फिल्म से कुछ पहले ही चलताऊ किस्म की कई फिल्मों ने लंबा समय खींच लिया था।
इन सबसे हटकर मेरे विचार में ‘लेकिन’ को देखना सचमुच किसी तीर्थ यात्रा से कम सुखद अनुभव नहीं है। ऐसा चित्र, जो कम से कम मुझसे तो कहता ही है कि ‘रेवा को मुक्ति मिली या नहीं? समीर तो रेवा को रेगिस्तान के पार कर गया, लेकिन समीर को रेवा की याद से जुड़ी स्नेहिल छटपटाहट से शांति मिली या नहीं? उस्ताद मेहराज अली तो रहे नहीं। फिर क्या समीर ने यह किया कि मरुस्थल के एक कोने पर अब नितांत अकेली रह रहीं तारा दीदी को अपने साथ लेकर बॉम्बे आ गया? आखिर हुआ क्या उस हवेली का, जहां रेवा ने समीर को पहले पागल और फिर दीवाना कर दिया था?’
मैं जानता हूँ कि ये कोरी भावुकता है। लेकिन है तो मेरे लिए वह मामला, जो तमीज के सिनेमा के सम्मान से जुड़ा हुआ है। सिनेमा मेरी प्राण-वायु है। फिर जब ‘लेकिन’ की बात हो तो उन उन शब्दों का चयन कठिन हो जाता है, जिनमें बताया जा सके कि मैं अपने तई किस अविस्मरणीय चित्र की बात कर रहा हूँ। ‘रंगमहल’ में इस फिल्म को मैंने अपनी बहन के साथ देखा था। इस बारे में हमने बात भी की। तय हुआ कि जल्दी ही इसे फिर देखने जाएंगे। मगर हमारी इस आरजू की जिंदगी उस एक सप्ताह से भी कम में ख़त्म हो गई, जब ये फिल्म हट गयी।मुझे आज भी याद है कि हम दोनों फिर रंगमहल गए थे और वहां ‘लेकिन’ की जगह कुछ और का ही पोस्टर लगा हुआ था। दर्शकों की भारी भीड़ के साथ। फिर भी इस एक सप्ताह की अवधि के सुख को मैंने बाद के कम से कम 99 बार ऑनलाइन पाया है। हाँ, बड़े परदे पर ‘लेकिन’ को फिर न देख पाने का मलाल अब तो मेरा प्रारब्ध होकर रह गया है। कभी कोई पागलपन की इस डगर पर चले तो यह विश्वास रखे कि मैं कहीं उसका हृदय के साथ इन्तजार करता रहूँगा। यह कहकर कि ‘लेकिन तो देखी, लेकिन तुम्हें भी मेरी तरह छटपटाहट साल रही है ना?’
(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी ने लिखा)


