क्या भारतीय जनता पार्टी की मध्यप्रदेश सरकार सहित पार्टी का संगठन भी सरकार के एक मंत्री से डरते हैं? वैसे ऐसा होना तो नहीं चाहिए, लेकिन दिख तो कुछ ऐसा ही रहा है.
ये मंत्री हैं विजय शाह. फिलहाल शाह के पास डॉक्टर मोहन यादव की सरकार में जनजातीय कल्याण महकमा है. यह तो सभी को पता है कि शाह किसलिए नए सिरे से विवाद में आ गए हैं और कैसे उन्होंने भारतीय सेना की शान कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ बेहद बुरी टिप्पणी की.
मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ गया है. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कई दिग्गज विरोधी ने विजय शाह के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
इस सबके बीच शाह लपक कर भोपाल आए. भले ही कहने और लिखने के लिहाज से कह और लिख दिया जाए कि शाह हाँफते-दौड़ते हुए भोपाल पहुंचे, लेकिन यहां उनकी बॉडी लैंग्वेज देखने के बाद यही लगा शाह तफरीह के अंदाज में आए हैं.
शाह ने मंगलवार को भोपाल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा से मुलाक़ात की. इस मसले पर अपनी सफाई दी. मगर बात नहीं बनी. तब शाह को मीडिया के सामने कहना पड़ा कि वो अपने कहे के लिए दस बार माफी मांगते हैं.
मगर इस सारे एपिसोड के दौरान भी शाह जिस तरह हँसते-चहकते रहे, उससे लगा कि उन्होंने माफी जुबान से मांगी है, दिल से नहीं।
यदि वाकई शाह की जुबान और दिल के बीच इतना बड़ा अंतर हो तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए।
क्योंकि शाह तो दो हजार तेरह के विधानसभा चुनाव के बीच सार्वजनिक मंच से उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह पर अभद्र टिप्पणी करने से नहीं चूके थे. इसके बाद शाह मंत्री पद से हटाए गए, तब भी उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं दिखा। उलटे अपने गृह जिले जाकर शाह ने साफ़ कहा कि वो खुद ही मंत्री पद को लात मारकर आए हैं. अब लात वाली बात का सच तो नहीं पता, लेकिन यह पता है कि शाह का यह सियासी वनवास चार महीने से भी कम में ख़त्म हो गया था. वो फिर शिवराज की सरकार में मंत्री बन गए. तो ऐसा क्या है कि तमाम विवादों के बाद भी शाह किसी बादशाह की तरह ठप्पे से बच जाते हैं.
दरअसल शाह आदिवासी गोंड समाज से आते हैं. गोंड राजघराने से उनका नाता है. राजघराना और आदिवासी होने के चलते उनका इस वर्ग के बीच जोरदार असर है.
शाह इसी दम पर उन्नीस सौ नब्बे से लेकर अब तक आठ बार हरसूद सीट से विधानसभा का चुनाव जीतते चले आ रहे हैं.
भाजपा को डर रहता है कि यदि शाह के खिलाफ कोई बड़ा एक्शन लिया तो इसके रिएक्शन में आदिवासी समुदाय उससे नाराज हो सकता है.
विजय शाह भी अपने इस फियर फैक्टर से वाकिफ हैं और इसीलिए खुद के कहे से तमाम बवाल खड़े होने के बाद भी वो तसल्ली के साथ ठहाके मारते हुए नजर आ आ जाते हैं.
यकीनन सोफिया कुरैशी वाला मामला बहुत बड़ा है. क्योंकि शाह ने उन कर्नल का अपमान किया है, जिन्हें सारा देश सिर-आँखों पर बिठा रहा है. अब भाजपा ने भले ही शाह को आँख दिखा दी हो, लेकिन वो उनकी नजरें शर्म से नीचे शायद ही कर पाए. क्योंकि शाह आदिवासी वोट बैंक की शह देकर मात देने वाला खेल बहुत अच्छे से जानते हैं.
(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी)


