Monday, January 19, 2026
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सनी: बॉलीवुड की उथली सोच में सनी दुर्भाग्यपूर्ण सनसनी 

बॉलीवुड की सनसनी सनी लियोनी आज 13 मई, 2025 को अपने जीवन के 44 वे वसंत में प्रवेश कर गई हैं. 

बात की शुरूआत उस दिन से, जब सनी दक्षिण भारत के केरल में किसी सिलसिले में पहुँची। उन्हें देखने के लिए इतनी भीड़ उमड़ी कि सनी जिस कार में सवार थीं, उस कार के आसपास लोगों के चलते केरल की उस मुख्य सड़क पर जाम लग गया था. 

सनी ने तब इसकी तस्वीर साझा करते हुए सोशल मीडिया पर अपने प्रशंसकों का आभार जताया था.

तब किसी ने इस पोस्ट पर सनी की फिल्मों को लेकर उनके प्रशंसकों की ‘कामुकता’  के बारे में एक घनघोर रूप से वाहियात टिप्पणी की थी. 

मानसिक दीवालियापन भी यदि वैचारिक प्रतिनिधित्व करने लगे तो फिर शायद वह ही होता है, जो सनी की पोस्ट के जवाब में किया गया. 

करनजीत कौर वोहरा यानी सनी निश्चित ही मादक रूप में सनसनी हैं, लेकिन उनका वह रूप परदे पर ही है. अपने निजी जीवन में उन्होंने विशुद्ध रूप से शालीनता का परिचय ही दिया है. 

सनी ने जिन जगहों पर एक्स रेटेड फिल्मों में काम किया, वहां उस पर कोई कानूनी रोक नहीं थी. लेकिन बॉलीवुड में ‘बेबी डॉल मैं सोने की’ के बाद सनी को लेकर इतने आपत्तिजनक प्रचार हुए कि उन्हें यह सफाई देना पड़ गई कि वो ‘वैसी’ नहीं हैं, जैसा उन्हें प्रचारित किया जा रहा है. 

खैर, कहने वालों का क्या? बाकी सनी को जब ‘एक पहली लीला’ में देखा तो लगा कि उनके भीतर अभिनय की जोरदार प्रतिभा है, लेकिन निर्देशक परदे पर उनके भीतर का कुछ और ही दिखाने  पर आमादा थे. मामला किसी प्रतिभा को तराशने की जगह मुनाफा कमाने वाली मानसिकता का जो ठहरा। 

बॉलीवुड का दुर्भाग्य यह कि यहां सनी जैसी अन्य भी छिपी हुए प्रतिभाओं को सामने लाने की बजाय ‘रगड़ कर फायदा उठा लो’ वाली मानसिकता हावी है. इसलिए मुनाफाखोरी वाली सोच में आपादमस्तक डूबे हुए लोग किसी के ऊपर लगे ‘लालच’ भरे ठप्पे का फायदा उठाने के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं. 

इसीलिए तो मशहूर पॉप सिंगर समांथा फॉक्स जब हिंदी फिल्म के परदे पर दिखती हैं, तो उनसे सबसे  पहला काम शरीर के ऊपर का कपड़ा उतरवाने का किया जाता है.

बाकी उन पर फिल्माए गए गीत के चवन्नी छाप बोल तो यह निकृष्ट सोच बताने के लिए पर्याप्त होते हैं कि ‘सामंथा ही तो है, तमीज का रोल दे दिया तो उसे देखने कौन आएगा?’ 

ये दुर्भाग्यजनक सोच बॉलीवुड पर हावी ही रहेगी। क्योंकि जिन मल्लिका शेरावत को बड़े परदे पर ‘कम से कम कपड़ों’ में दिखाया गया, उन्हीं मल्लिका ने छोटे परदे पर ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ में अपने सादगी भरे अंदाज में जबरदस्त अभिनय प्रतिभा का परिचय दे दिया। लेकिन बड़े परदे का छोटापन इसे शायद ही कभी समझ सके. 

सनी को मिली फ़िल्में देख लीजिए। कमोबेश हर फिल्म देखकर लगता है कि निर्देशक ने यह सोचकर ही संतोष कर लिया कि कम से कम सनी के हिसाब से कपड़ों का न्यूनतम खर्च ही सहन करना होगा।

ये न्यूनतम वाली सोच वह महानतम घटियापन है, जिसमें सच्ची अभिनय प्रतिभा को देखने वालों को निराश ही होना पड़ेगा। क्योंकि यहां सिल्क स्मिता को लेकर तो नंग-धडंग अंदाज वाली बायोपिक बन सकती है, लेकिन सनी जैसी प्रतिभाओं के सच को सामने लाने के लिए सभ्य लिबास पहनने वाली सोच का यहां नितांत दरिद्रपन फैला हुआ है. 

शुरू में सनी को ‘सनसनी’ कहा गया, लेकिन दुर्भाग्य यह कि ये सनसनी बॉलीवुड की उथली सोच में सनी मानसिकता की शिकार होकर ही रह गई है. 

(लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी)