Sunday, January 18, 2026
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साध्वी प्रज्ञा ठाकुर; फैसला चाहे जो आए, लेकिन ये सब किसके लिए किया गया होगा….? 

वो  दिसंबर की कोहरे से घिरती शाम थी. ठंड और बढ़े, इससे पहले ही चाय पीने की गरज से मैं अपने उस समय वाले अख़बार के दफ्तर से बाहर चला आया. सामने ही एक सहकर्मी पर नजर पड़ी. उनके साथ तीन अजनबी चेहरे थे. दो पुरुष और तीसरी कोई युवती।  पूरे मर्दाने लिबास में. बाल भी लड़कों जैसे कटे हुए. लड़की कुछ आवेश वाले अंदाज में अपनी बात कह रही थी.

सहकर्मी ने मुझे देखा और साथ वाले तीनों चेहरों पर उनकी नजर ख़ास कोण से तैर गई. वो तीनों दूसरी तरफ चले गए. सहकर्मी ने अपने हाथ में चाय के गिलास को मेरे लिए ‘चीयर्स’ वाले अंदाज में लहराया। हालांकि उनके चेहरे पर ‘चीयर’ वाले भाव नहीं थे. 

मैं एक कोने में खड़ा रहकर चुपचाप चाय पीने लगा. भोपाल के प्रेस कॉम्प्लेक्स में यूं ही वाहनों की भारी आवाजाही रहती है. उस पर यह तो शाम का समय था. दफ्तर छूट रहे थे. साथ की पूरी सड़क गाड़ियों के कर्कश हॉर्न से गूँज रही थी. बहुत पास खड़े किसी व्यक्ति की बात सुनना भी मुश्किल था. फिर सहकर्मी और उसके तीन परिचित तो मुझे पहले ही सुरक्षित दूरी पर जा चुके थे. युवती बोल रही थी. शेष तीनों में से किसी के मुंह से कुछेक शब्द निकलते महसूस हुए, लेकिन यह तय था कि उस बातचीत पर वह युवती ही अधिकार जमा चुकी है.  

इसके कई साल बाद मालेगांव में धमाके की खबर सुनी। उसके भी एक अरसा बाद जब एक चेहरा संदिग्धों में नजर आया तो प्रेस काम्प्लेक्स वाली वह शाम फिर याद हो आई. क्योंकि चाय के खोमचे पर खड़ी वह युवती साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ही थी. हाँ, चेहरे और पहनावे में काफी अंतर आ चुका था. मर्दों जैसे बाल तो अब भी थे, लेकिन जिस्म को भगवा ने ओढ़ रखा था और चेहरा भी काफी भरा हुआ-सा दिखने लगा था. 

और भी अरसा बीता। फिर अचानक एक शाम परिवार का कार्यक्रम बना कि कलियासोत की पहाड़ी पर चला जाए. बेटा तब  काफी छोटा था. पहाड़ी पर दौड़ते-दौड़ते वो पास के एक अस्पताल के परिसर में चला गया. अचानक  रौबदार चेहरा लिए एक पुलिस वाले की वहां एंट्री हुई. उसने बेटे को आँख के इशारे से आगे आने से मना किया। मैं तमतमाहट वाले अंदाज में आगे बढ़ा और एक झटके में मेरा ये भाव जाता रहा. पुलिस वाले के पीछे एक व्हीलचेयर पर प्रज्ञा ठाकुर बैठी हुई थीं. बेहद कमजोर। पहले जैसा कुछ भी नहीं, सिवाय उन छोटे बालों के. मैंने महसूस किया कि उनकी आँखों में मेरे बेटे के लिए लाड़ झलक आया था. फिर उन्होंने पुलिस वाले की पीठ को देखा और निराश आँखों के साथ दूसरी तरफ देखने लगीं। 

प्रज्ञा ठाकुर सांसद बनीं, उसके बाद तो उन्हें न जाने कितनी बार देखा। सांसदी जाने (‘लिए जाने’ कहना बेहतर होगा) के बाद भी उन्हें देखा। लेकिन अब एक नए नजरिए से उन्हें देखने की इच्छा हो रही है. क्योंकि बहुत मुमकिन है कि आने वाली 31 जुलाई को उनके मामले में फैसला आ जाए. निर्णय क्या होगा? अदालत जाने। निर्णय कितना सही या गलत माना जाएगा, इसके लिए सोशल मीडिया की समानांतर अदालतें अभी से तलवारें भांजने लगी हैं, लिहाजा उनके अघोषित किंतु स्व-निर्मित इस अधिकार के क्षेत्र से खुद को बाहर रखने में ही भलाई है. 

क्या वाकई आरोप सही हैं? यदि हाँ तो ऐसा किसके हक और हित को ध्यान में रखकर किया गया होगा? 

क्या वाकई आरोप गलत हैं? यदि हाँ तो ऐसा किसके हक और हित को ध्यान में रखकर किया गया होगा ?

शिरडी से लौटते समय एक बार कुछ देर के लिए मालेगांव में चाय पीने रुका था. वो भोपाल के प्रेस कॉम्प्लेक्स वाली सर्द शाम नहीं थी, अलबत्ता महीना दिसंबर का ही था. ये दो सवाल मेरे मन में वहां भी उठे, लेकिन एक बार फिर उठे ट्रैफिक के कानफोड़ू शोर ने मुझे कान बंद करने पर मजबूर कर दिया। आने वाली 31 जुलाई को अब और कोई शोर न उठे, बस इतना ही चाह रहा हूँ. क्योंकि अब ये अपने-अपने सच को बहुत गौर से सुनने का समय होगा।  

( लोकदेश के लिए रत्नाकर त्रिपाठी की रिपोर्ट)